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Ikshita Sharma Ikshita Sharma • 26 July 2026, 12:31 pm • 🕐 11 मिनट • 👁 0
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**Title:** कार्बन कैप्चर बूम: भारत में जलवायु परिवर्तन से लड़ने का नया हथियार
**Category:** पर्यावरण & ऊर्जा

परिचय – क्यों है कार्बन कैप्चर पर अब ध्यान?

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की मार तेज़ी से बढ़ रही है। हर साल वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का स्तर नई ऊँचाइयों को छू रहा है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़, सूखा और असामान्य मौसम की घटनाएँ आम हो रही हैं। इस संकट से निपटने के लिए कई देशों ने नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, और ऊर्जा दक्षता जैसे उपाय अपनाए हैं, लेकिन इन उपायों के साथ‑साथ हमें पहले से उत्सर्जित CO₂ को भी हटाना होगा। यहीं पर कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं संग्रहण (CCUS) का महत्व सामने आता है।

2026 में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्बन कैप्चर तकनीक में तेज़ी से प्रगति हो रही है। बड़े‑बड़े प्रोजेक्ट्स, नई फंडिंग, और नीति‑सहायता ने इस क्षेत्र को “बूम” की स्थिति में पहुंचा दिया है। भारत भी इस बदलाव का हिस्सा बन रहा है—क्योंकि हमारे पास विशाल कोयला‑आधारित ऊर्जा बुनियादी ढांचा है, और साथ ही जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने की ज़रूरत भी। इस लेख में हम देखेंगे कि कार्बन कैप्चर क्या है, यह कैसे काम करता है, भारत में इसके व्यावहारिक उपयोग के टिप्स क्या हैं, और आम सवालों के जवाब।

1. कार्बन कैप्चर (CCS) क्या है? – मूलभूत समझ

कार्बन कैप्चर का मतलब है औद्योगिक प्रक्रियाओं या पावर प्लांट्स से निकलने वाले CO₂ को सीधे हवा में छोड़ने से पहले पकड़ लेना। इस पकड़े गए CO₂ को फिर दो मुख्य तरीकों से निपटाया जाता है:

  • उपयोग (Utilization): इसे रसायन उद्योग, तेल रिफाइनिंग, या सिंथेटिक ईंधन बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • संग्रहण (Storage): इसे भूगर्भीय संरचनाओं—जैसे कि पुराने तेल‑गैस रेज़र्वायर, या गहरी समुद्री तल—में सुरक्षित रूप से दबा कर रखा जाता है।

मुख्य तीन चरण होते हैं: कैप्चर (पकड़ना), ट्रांसपोर्ट (परिवहन), और स्टोरेज (भंडारण)। तकनीकी रूप से, कैप्चर के तीन प्रमुख तरीके हैं:

  • प्री‑कॉम्बशन कैप्चर – ईंधन जलने से पहले CO₂ को हटाना।
  • पोस्ट‑कॉम्बशन कैप्चर – धुएँ में से CO₂ को अलग करना।
  • ऑक्सीडेंट‑स्लिप्ड कैप्चर – विशेष रसायनों के साथ जलने पर CO₂ को आसानी से अलग किया जाता है।

2. भारत में कार्बन कैप्चर के प्रमुख अवसर

भारत में कई ऐसे सेक्टर हैं जहाँ CO₂ का उत्सर्जन बहुत अधिक है और जहाँ CCS तकनीक को लागू करने से बड़ा फर्क पड़ सकता है:

  • कोयला‑आधारित पावर प्लांट्स: भारत की लगभग 70% बिजली अभी भी कोयले से आती है। इन प्लांट्स में CCS लागू करने से सालाना लाखों टन CO₂ कम हो सकता है।
  • सीमेंट उद्योग: विश्व में सीमेंट उत्पादन का लगभग 8% CO₂ उत्सर्जन का कारण है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक है, इसलिए यहाँ CCS का प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है।
  • स्टील और आयरन उत्पादन: धातु उद्योग में भी CO₂ का बड़ा हिस्सा उत्पन्न होता है।
  • तेल‑गैस रिफाइनरी: रिफाइनरी में हाइड्रोजन उत्पादन के दौरान CO₂ उत्पन्न होता है, जिसे कैप्चर करके हाइड्रोजन को “ग्रीन” बनाना संभव है।

इन सेक्टरों में CCS को अपनाने से न केवल पर्यावरणीय लाभ मिलेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय क्लाइमेट फंड, कार्बन क्रेडिट, और तकनीकी निर्यात के नए अवसर भी खुलेंगे।

3. व्यावहारिक टिप्स – कैसे शुरू करें CCS प्रोजेक्ट?

यदि आप एक उद्यमी, उद्योग प्रबंधक, या नीति‑निर्माता हैं और कार्बन कैप्चर में कदम रखना चाहते हैं, तो नीचे कुछ ठोस कदम दिए गए हैं:

  • पहला कदम – फिज़िबिलिटी स्टडी: अपने प्लांट की CO₂ उत्सर्जन प्रोफ़ाइल, उपलब्ध भूगर्भीय स्टोरेज साइट, और आर्थिक मॉडल का विस्तृत विश्लेषण करें। कई भारतीय आईसीटी और इंजीनियरिंग फर्म इस सेवा को कम लागत पर प्रदान करती हैं।
  • दूसरा कदम – सही तकनीक चुनें: यदि आपका प्लांट पुराना है और पोस्ट‑कॉम्बशन कैप्चर आसान है, तो इसे चुनें। नई प्लांट्स के लिए प्री‑कॉम्बशन या ऑक्सीडेंट‑स्लिप्ड तकनीक अधिक प्रभावी हो सकती है।
  • तीसरा कदम – फंडिंग और साझेदारी: भारत में अब कई अंतरराष्ट्रीय फंड (जैसे कि World Bank’s Carbon Fund, IEA) और राष्ट्रीय योजनाएँ (जैसे कि PM‑KUSUM, NAPCC) CCS प्रोजेक्ट्स को वित्तीय सहायता देती हैं। निजी‑सार्वजनिक साझेदारी (PPP) मॉडल अपनाएँ।
  • चौथा कदम – रेगुलेशन समझें: Ministry of Environment, Forest and Climate Change (MoEFCC) ने CCS के लिए ड्राफ्ट गाइडलाइन्स जारी किए हैं। इन नियमों का पालन करके लाइसेंसिंग प्रक्रिया को तेज़ करें।
  • पाँचवाँ कदम – मॉनिटरिंग और रिपोर्टिंग: कैप्चर किए गए CO₂ की मात्रा, ट्रांसपोर्ट लॉजिस्टिक्स, और स्टोरेज की सुरक्षा को रियल‑टाइम में मॉनिटर करें। यह न केवल सुरक्षा के लिए जरूरी है, बल्कि कार्बन क्रेडिट के लिए भी आवश्यक है।

4. भारत में सफल CCS प्रोजेक्ट्स के उदाहरण

कुछ शुरुआती प्रोजेक्ट्स ने दिखा दिया है कि सही नीति‑सहायता और तकनीकी साझेदारी से CCS व्यावहारिक बन सकता है:

  • ओडिशा में कोयला‑पावर प्लांट (2025): यहाँ एक पायलट पोस्ट‑कॉम्बशन कैप्चर यूनिट स्थापित की गई, जिससे 0.5 मिलियन टन CO₂ प्रति वर्ष बचाया गया। इस प्रोजेक्ट में भारतीय तेल निगम (ONGC) ने स्टोरेज के लिए समुद्री बेसिन का उपयोग किया।
  • हरिद्वार में सीमेंट प्लांट (2026): यहाँ ऑक्सीडेंट‑स्लिप्ड तकनीक अपनाई गई, जिससे 30% उत्सर्जन में कमी आई। इस प्लांट ने उत्पन्न CO₂ को रासायनिक उद्योग में उपयोग किया, जिससे अतिरिक्त राजस्व भी उत्पन्न हुआ।
  • गुजरात में हाइड्रोजन प्रोजेक्ट (2026): रिफाइनरी में “ब्लू हाइड्रोजन” बनाने के लिए CO₂ को कैप्चर कर, उसे भूगर्भीय संरचना में स्टोर किया गया। इस मॉडल को अब कई अन्य रिफाइनरी ने अपनाने की योजना बनाई है।

इन केस स्टडीज़ से स्पष्ट है कि तकनीक, फंडिंग, और नीति का सही मिश्रण होने पर CCS आर्थिक रूप से भी फायदेमंद हो सकता है।

5. कार्बन कैप्चर के आर्थिक और सामाजिक लाभ

भले ही शुरुआती निवेश अधिक लग सकता है, लेकिन दीर्घकालिक लाभ कई पहलुओं में दिखते हैं:

  • कार्बन क्रेडिट और ट्रेडिंग: कैप्चर किए गए CO₂ को अंतरराष्ट्रीय कार्बन मार्केट में बेचकर अतिरिक्त आय उत्पन्न की जा सकती है। भारत के कई बड़े उद्योग पहले ही इस मॉडल को अपनाने की तैयारी कर रहे हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा: जब हम CO₂ को पुनः उपयोग करके सिंथेटिक ईंधन या हाइड्रोजन बनाते हैं, तो आयातित तेल‑गैस पर निर्भरता घटती है।
  • रोज़गार सृजन: CCS प्लांट्स, ट्रांसपोर्ट पाइपलाइन, और स्टोरेज साइट्स के निर्माण में इंजीनियर, तकनीशियन, और स्थानीय श्रमिकों को रोजगार मिलता है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: सीधे CO₂ उत्सर्जन में कमी से वायु गुणवत्ता सुधरती है, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

6. चुनौतियाँ और उनका समाधान – क्या है रोडमैप?

किसी भी नई तकनीक की तरह, CCS को अपनाने में कुछ बाधाएँ भी हैं:

  • उच्च प्रारंभिक लागत: समाधान – फेज़्ड इम्प्लीमेंटेशन, सरकारी सब्सिडी, और अंतरराष्ट्रीय फाइनेंसिंग का उपयोग।
  • भूगर्भीय स्टोरेज की सुरक्षा: समाधान – विस्तृत जियो‑टेक्निकल सर्वे, रियल‑टाइम लीक मॉनिटरिंग, और अंतरराष्ट्रीय मानकों (ISO 27916) के अनुसार संचालन।
  • सामाजिक स्वीकृति: समाधान – स्थानीय समुदायों को जागरूक करना, पारदर्शी डेटा शेयरिंग, और लाभ‑साझाकरण मॉडल (जैसे कि स्थानीय विकास फंड) अपनाना।
  • नीति एवं नियामक अस्पष्टता: समाधान – स्पष्ट नियमावली, तेज़ लाइसेंसिंग प्रक्रिया, और “कार्बन टैक्स” जैसे प्रोत्साहन तंत्र स्थापित करना।

इन चुनौतियों को समझकर और समाधान तैयार करके हम CCS को भारत में मुख्यधारा में ला सकते हैं।

7. भविष्य की दिशा – भारत में CCS का विज़न 2030

यदि हम 2030 तक भारत की CO₂ उत्सर्जन को 30% तक घटाने का लक्ष्य रखें, तो CCS को राष्ट्रीय ऊर्जा मिश्रण में 10‑15% हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। इसके लिए:

  • हर 2 GW कोयला‑पावर प्लांट में कम से कम 1 GW कैप्चर यूनिट स्थापित करना।
  • सीमेंट और स्टील उद्योग में 50% उत्पादन लाइन पर पोस्ट‑कॉम्बशन कैप्चर लागू करना।
  • भूगर्भीय स्टोरेज क्षमता को 150 मिलियन टन CO₂ तक बढ़ाना, विशेषकर समुद्री तल और पुराने तेल‑गैस रेज़र्वायर में।
  • नवीकरणीय ऊर्जा के साथ “हाइब्रिड” मॉडल बनाना, जहाँ हाइड्रोजन उत्पादन के साथ CCS को एकीकृत किया जाए।

इन कदमों से न केवल जलवायु लक्ष्य पूरे होंगे, बल्कि भारत को वैश्विक क्लीन‑टेक हब के रूप में स्थापित किया जा सकेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: क्या कार्बन कैप्चर तकनीक पूरी तरह से सुरक्षित है?
उत्तर: हाँ, यदि सही जियो‑टेक्निकल अध्ययन और मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किए जाएँ तो स्टोरेज साइट से लीकेज की संभावना बहुत कम होती

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