UK अदालतों में AI कानूनी सहायक! केस बैकलॉग घटाने के लिये तुरंत क्या किया जा रहा है
पिछले कुछ हफ़्तों में एक बड़ी ख़बर ने कानूनी जगत के साथ-साथ आम जनता की भी ज़रूरतों को छू लिया – यूके के कुछ प्रमुख कोर्टों ने “AI‑सहायता” को औपचारिक रूप से अपनाया है। अदालतों में बढ़ते केस बैकलॉग, ज्यूरी व वकीलों की भारी कार्यभार और सॉल्विंग टाइम में कमी को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने कृतिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) को एक “पूरक” के रूप में पेश किया है। यह कदम न केवल न्याय प्रक्रिया को तेज़ करेगा, बल्कि भारत जैसे देशों के लिए भी एक प्रेरणा बन सकता है।
1. क्यों जरूरी था AI का प्रवेश? – केस बैकलॉग की कठोर सच्चाई
ब्रिटेन में, विशेषकर सिविल कोर्ट और मजिस्ट्रेट ट्रायब्यूनल में केस का बैकलॉग 2022‑2023 में 25 % तक बढ़ गया था।
मुख्य कारण:
- कोरोना‑19 के बाद की कार्यशैली में बदलाव, दूरस्थ सुनवाई के लिए तैयारियों की कमी।
- वकीलों, जजों और कोर्ट स्टाफ़ की सीमित संख्या।
- क्लेम्स की जटिलता में वृद्धि – टेक्नोलॉजी, डेटा‑प्राइवेसी, साइबर‑क्राइम इत्यादि।
इन समस्याओं को हल करने के लिए, यूके की डिपार्टमेंट फॉर बिचर्ड जस्टिस (DBJ) ने एक पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च किया, जिसमें AI‑सहायता को “ड्राफ्टिंग, रीव्यू और रिसर्च” के तीन मुख्य चरणों में उपयोग किया जाएगा।
2. AI कानूनी सहायक – अब क्या है, कैसे काम करता है?
UK में लागू “Legal AI Assist” दो प्रमुख घटकों से मिलकर बना है:
- डेटा इंटेग्रेशन लेयर – मौजूदा केस फाइलों, कोर्ट रेकॉर्ड और डिजिटल डिपॉजिटरी से डेटा को इकट्ठा कर एक संरचित रूप देता है।
- जेनरेटिव मॉडल (LLM) – जनरेटिव AI (जैसे GPT‑4, Claude) को प्रशिक्षित कर निर्णय‑संदर्भ, प्रीसिडेंट्स और रूल‑ऑफ‑लेज के साथ विश्लेषण कर रिपोर्ट तैयार करता है।
मुख्य कार्य:
- प्राथमिक तथ्य‑संकलन – केस के दस्तावेज़ स्कैन कर, मुख्य प्रश्न, पक्षों की दलीलें और तारीखें निकालता है।
- लीगल रिसर्च – समान प्रीसिडेंट्स, हाईकोर्ट और कोर्ट ऑफ़ अपील के निर्णयों को तेज़ी से खोजकर सारांश बनाता है।
- ड्राफ्ट जजिंग मेमो – AI जज को एक प्रारंभिक मेमो देता है, जिसमें मुद्दे, लागू नियम और संभावित रूल‑ऑफ‑लेज दिखते हैं।
- रिव्यू एण्ड एडिट – जज या वकील द्वारा AI‑ड्राफ्ट में सुधार किया जाता है; यह प्रक्रिया “ह्यूमन‑इन‑द‑लूप” (Human‑in‑the‑Loop) कहलाती है।
3. पायलट प्रोजेक्ट की सफलता: आँकड़े और फीडबैक
पहले 6 महीनों में 1,200 से अधिक केसों पर AI‑सहायता का प्रयोग किया गया। यहाँ कुछ प्रमुख परिणाम हैं:
- टाइम‑टू‑डिलिवरी में 35 % कमी – औसत 14 दिन से घटकर 9 दिन।
- रिकरेंट त्रुटियों में 40 % गिरावट – मानवीय रेफरेंस की तुलना में AI ने मिस‑क्लासिफ़िकेशन कम किया।
- वकीलों की संतुष्टि दर 78 % तक बढ़ी – उन्होंने “समय बचत” और “रेसर्च की सटीकता” को प्रमुख बिंदु बताया।
इसी दौरान, जजों ने भी संकेत दिया कि AI की “ड्राफ्ट मेमो” के साथ काम करने से उन्हें “समीक्षा में अधिक फोकस” मिलता है और “साइड‑इश्यूज़” को नजरअंदाज करने की संभावना घटती है।
4. भारतीय न्यायिक प्रणाली में AI को अपनाने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए?
भारत में भी लम्बे केस बैकलॉग और न्याय प्रक्रिया में देरी एक आम समस्या है। यूके के अनुभव से सीखते हुए हमें निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:
- डेटा इंफ़्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाना – सभी कोर्ट रिकॉर्ड को डिजिटल और मानकीकृत फॉर्मेट में रखना।
- नियामक फ्रेमवर्क तैयार करना – AI की विश्वसनीयता, डेटा प्राइवेसी और एथिकल गाइडलाइन पर स्पष्ट नीतियाँ बनाना।
- पायलट प्रोग्राम लॉन्च करना – हाई कोर्ट या विशेष ट्रायब्यूनलों में पहले 100‑200 केसों पर AI‑सहायता लागू करना।
- ह्यूमन‑इन‑द‑लूप को अनिवार्य बनाना – AI के आउटपुट को हमेशा जज या वरिष्ठ वकील की समीक्षा के बाद ही अंतिम माना जाए।
- ट्रेनिंग एवं अपस्किलिंग – कोर्ट स्टाफ़, जज और वकीलों को AI‑टूल्स के उपयोग में प्रशिक्षित करना।
5. AI को अपनाते समय कानूनी और एथिकल चुनौतियां
AI को कोर्ट में लाते समय हमें कई संवेदनशील मुद्दों पर विचार करना आवश्यक है:
- डेटा गोपनीयता – केस फ़ाइलों में निजी जानकारी होती है; इन्हें सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन और डेटा‑मैपिंग नियमों का पालन करना होगा।
- भेदभाव या पक्षपात (Bias) – अगर AI मॉडल को पूर्व न्यायिक डेटा से ट्रेन किया गया हो तो उसमें मौजूदा बायस (जैसे जाति, लिंग) परिलक्षित हो सकता है। इसलिए निरंतर बायस‑ऑडिट आवश्यक है।
- जवाबदेही (Accountability) – AI के कारण निर्णय में त्रुटि होने पर किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा? यह स्पष्ट संवैधानिक दिशा‑निर्देशों में परिभाषित होना चाहिए।
- न्यायिक स्वतंत्रता – AI का उपयोग जज की स्वतंत्र सोच को सीमित नहीं करना चाहिए; यह केवल “सहायक” बनकर काम करे।
6. भारत में पहले से चल रहे AI‑प्रोजेक्ट्स
भले ही यूके का प्रयोग अभी नवाचार के रूप में सामने आया हो, भारत में भी कई पहलें चल रही हैं:
- e‑Courts परियोजना – केस फाइलिंग, शेड्यूलिंग और रिव्यू को डिजिटल बनाना।
- AI‑बेस्ड रेफ़रेंस टूल्स – लॉफ़र्म्स द्वारा “CaseText”, “ROSS Intelligence” जैसी टूल्स का उपयोग।
- डिजिटल साक्ष्य विश्लेषण – साइबर‑क्राइम कोर्ट में AI‑सहायता से फ़ोरेंसिक डेटा का तेज़ विश्लेषण।
इन सबके साथ, यूके के पायलट ने हमें यह दिखाया कि सही नियमन और “Human‑in‑the‑Loop” के साथ AI को कानूनी प्रक्रिया में सरलग किया जा सकता है।
7. प्रैक्टिकल टिप्स – अगर आप एक वकील या जज हैं तो AI को कैसे अपनाएँ?
AI को अपनाना सिर्फ तकनीक की बात नहीं, बल्कि आपके वर्कफ़्लो को री‑डिज़ाइन करने की भी आवश्यकता है। नीचे कुछ व्यावहारिक कदम दिए गए हैं, जो तुरंत लागू किए जा सकते हैं:
- क्लेमस के लिए “डिजिटल फ़ाइलिंग” अपनाएँ – PDF, DOCX, या XML फॉर्मेट में सभी दस्तावेज़ स्टोर करें।
- AI‑सहायता वाले रिसर्च टूल्स को ट्रायल करें – “ChatGPT‑Legal”, “LexisNexis AI” आदि को मुफ्त ट्रायल में प्रयोग करके देखें कि कौन सा आपके केस के हिसाब से बेहतर है।
- प्राथमिक ड्राफ़्ट को AI से जेनरेट करिए – केस पंचलाइन, मुख्य प्रश्न और प्रीसिडेंट्स को आउटपुट में लाएँ, फिर अपने नोट्स से कस्टमाइज़ करें।
- हेडिंग‑बेस्ड सर्क्यूलेशन – AI‑जनरेटेड सारांश को सहकर्मियों (जज, सीनियर एंगल) के साथ साझा करें, प्रतिक्रिया प्राप्त करें और “Human‑in‑the‑Loop” को मजबूत बनायें।
- डेटा प्राइवेसी चेकलिस्ट बनायें – केस अपलोड करने से पहले GDPR जैसी प्राइवेसी गाइडलाइन का पालन करें।
- नियमित बायस‑ऑडिट करें – प्रतिमाह AI आउटपुट में संभावित पक्षपात की जाँच के लिए एक छोटा समूह बनायें।
- फ़ीडबैक लूप बनायें – AI टूल से मिलने वाले सुझावों को अपने मसलन “प्री‑जजमेंट ब्रीफ़” में शामिल करें और उसके प्रभाव को मापें।
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1: क्या AI कोर्ट का निर्णय लेगा?
नहीं। वर्तमान में AI केवल “सहायक” के तौर पर काम करता है। अंतिम निर्णय हमेशा जज की मौजुदा विवेकाधिकार और न्यायिक स्वतंत्रता पर निर्भर रहेगा।
Q2: क्या AI के कारण मैं अपना काम खो दूँगा?
AI मौज़ूद कार्यों को तेज़ और सटीक बनाता है, लेकिन यह मानवीय विशेषज्ञता को प्रतिस्थापित नहीं करता। इसके कारण वकीलों और जजों का कार्य अधिक रणनीतिक और विश्लेषणात्मक बन जाता है।
Q3: अगर AI का आउटपुट गलत हो तो क्या होगा?
ह्यूमन‑इन‑द‑लूप (Human‑in‑the‑Loop) मॉडल में जज/वकील हमेशा आउटपुट की समीक्षा करता है। यदि त्रुटि पाई जाती है तो उसे सही किया जाता है, और इसी के साथ सिस्टम को भी “फ़ीडबैक लूप” के तहत अपडेट किया जाता है।
Q4: भारत में किन कोर्टों में AI अभी लागू हो रहा है?
वर्तमान में कई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की डिजिटल पहल में AI‑टूल्स का परीक्षण किया जा रहा है, जैसे “e‑Courts” पोर्टल में केस मैनेजमेंट AI, और कुछ प्री‑सर्विस रिसर्च टूल्स में AI का प्रयोग।
Q5: AI का उपयोग कर केस फाइलिंग में कितना खर्च आएगा?
शुरुआती खर्च में डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड सर्विसेज और लाइसेंसिंग शामिल हैं। परन्तु लम्बे समय में केस प्रोसेसिंग लागत में 20‑30 % तक कटौती की संभावना है, जैसा कि यूके पायलट में दिखाया गया।
निष्कर्ष: AI को न्याय का सहायक बनाइए, नहीं कि प्रतिस्थापित
UK में AI कानूनी सहायक की सफलतापूर्ण शुरुआत ने यह सिद्ध कर दिया है कि तकनीक, अगर सही ढंग से लागू की जाए, तो न्याय को तेज़, पारदर्शी और सुलभ बना सकती है। भारत में भी इस दिशा में कदम बढ़ाने का समय अब आ गया है। लेकिन एक बात याद रखें – AI को “सहायक” रखना चाहिए, “निर्णायक” नहीं। सार्वजनिक भरोसा, डेटा प्राइवेसी और न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए ही हम इस परिवर्तन को स्थायी बना सकते हैं।
यदि आप भी अपने कानूनी प्रैक्टिस या कोर्ट में AI को लागू करने के बारे में चर्चा करना चाहते हैं, तो नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार लिखें या info@itshindi.in पर हमें मैसेज भेजें। साथ मिलकर हम भारत की न्याय प्रणाली को डिजिटल युग में ले जा सकते हैं!
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